कबीरधामकवर्धाछत्तीसगढ़

अब गांव की चौखट पर भी टैक्स का दस्तक: पंचायतों को वसूलने होंगे संपत्ति, पानी और सफाई के पैसे

रवि मानिकपुरी का तीखा सवाल: स्वतंत्रता के 75 साल बाद, क्या यही अच्छे दिन हैं?

कबीरधाम :- शहरों के बाद अब गांवों की बारी है। केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि विकास के लिए अब सिर्फ अनुदान का इंतजार नहीं होगा। हर ग्राम पंचायत को अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ेगा। इसी कड़ी में देश भर की ग्राम पंचायतों को संपत्ति कर, जल कर, सफाई शुल्क और प्रकाश कर वसूलने के सख्त निर्देश दिए गए हैं।

पिछले 30 साल से ये अधिकार सिर्फ कागजों पर था। अब फंड रोकने की चेतावनी के बाद ये जमीन पर उतरने जा रहा है।

पृष्ठभूमि: 1992 का कानून अब 2026 में लागू

साल 1992 में संसद ने 73वां संविधान संशोधन पास किया था। इसी के अनुच्छेद 243H के तहत पंचायतों को “कर लगाने, वसूलने और खर्च करने” का अधिकार दिया गया था। मकसद था पंचायतों को वित्तीय रूप से सशक्त बनाना।

लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं हुआ। छत्तीसगढ़ समेत ज्यादातर राज्यों में पंचायतें चुनाव जीतने के बाद ग्रामीणों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती थीं। नतीजा: 3 दशक तक किसी ने टैक्स का नाम तक नहीं लिया। गांव की नाली, सड़क, पानी सब कुछ राज्य और केंद्र के भेजे हुए फंड से चलता रहा।

अब क्यों कड़ाई? फंड से जुड़ी शर्त

खेल तब बदला जब 15वें वित्त आयोग ने नई शर्त रख दी। 

केंद्रीय वित्त आयोग ने सभी राज्यों को पत्र लिखकर कहा: “जो पंचायतें अपना खुद का राजस्व यानी Own Source Revenue नहीं बढ़ाएंगी, उन्हें बुनियादी अनुदान की अगली किस्त नहीं मिलेगी।”

सीधे शब्दों में: टैक्स नहीं वसूला तो करोड़ों का विकास फंड रुकेगा। इसी दबाव में अब राज्य सरकारों ने पंचायतों को नोटिस भेजना शुरू कर दिया है।

सरकार का तर्क है कि जब शहर की नगर पालिका पानी और सफाई के लिए शुल्क ले सकती है, तो गांव की पंचायत क्यों नहीं? इससे गांव में सुविधाओं का रखरखाव बेहतर होगा और पंचायतें किसी पर निर्भर नहीं रहेंगी।

नया प्रावधान: गांव में अब क्या-क्या महंगा होगा

1. संपत्ति कर: गांव में 1 मंजिल से ऊपर बने पक्के मकान, दुकान और व्यावसायिक भवनों पर सालाना कर

2. जल कर: हर घर के नल कनेक्शन, हैंडपंप से पाइप लाइन और सामुदायिक पेयजल योजना पर मासिक/त्रैमासिक शुल्क

3. सफाई शुल्क: घर-घर कचरा संग्रहण, कचरा गाड़ी और डंपिंग यार्ड के रखरखाव के लिए

4. प्रकाश कर: गांव में लगी स्ट्रीट लाइट, हाईमास्ट लाइट और सामुदायिक भवनों की बिजली के लिए

अधिकारियों का कहना है कि दरें अभी तय नहीं हुई हैं। हर राज्य और पंचायत अपनी जरूरत के हिसाब से न्यूनतम दर तय करेगी।

राजनीति गरमाई: बीजेपी शासन में पहली बार  

इस फैसले के खिलाफ सबसे मुखर आवाज सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष रवि मानिकपुरी की है।

उन्होंने कहा: “ग्राम पंचायतों को भी देना होगा कर। क्या यही अच्छे दिन हैं?”

देश के इतिहास में स्वतंत्रता के बाद पहली बार ऐसा हो रहा है कि गांव में भी पानी का कर और मकान का कर लगेगा। और ये हो रहा है बीजेपी शासन में।

मानिकपुरी ने सरकार से 3 सवाल पूछे हैं

पहला, क्या इस बढ़ोतरी की वजह ग्रामीण इलाकों में प्रधानमंत्री आवास जैसी योजनाओं से हुए पक्के मकानों की संख्या बढ़ना है?

दूसरा, क्या महतारी वंदन जैसी बड़ी कल्याणकारी योजनाओं के लिए संसाधन जुटाने के लिए ग्रामीणों की जेब पर हाथ डाला जा रहा है?

तीसरा, पहले सुविधाएं दो, फिर कर लो। बिना 24 घंटे पानी और रोज कचरा उठाए शुल्क कैसे वसूलोगे?

गांव में क्या कह रहे लोग? मिलीजुली प्रतिक्रिया

पक्ष में:

कुछ युवा सरपंच और पंच इसे स्वागत योग्य कदम मान रहे हैं। “हर बार विधायक और सांसद के पास फंड के लिए हाथ फैलाना पड़ता है। अगर हमारे पास अपना पैसा होगा तो हम 15 दिन में नाली बनवा देंगे।”

विरोध में:

ज्यादातर ग्रामीण इसे “डबल मार” बता रहे हैं। उनका तर्क है: “पहले खेती की लागत बढ़ गई, डीजल महंगा है। अब हर महीने पानी का बिल भी आएगा। सरकार पहले 24 घंटे पानी और साफ सफाई दे, फिर टैक्स मांगे।”

महिलाओं का सबसे बड़ा सवाल सफाई शुल्क को लेकर है। उनका कहना है कि जब तक हर गली से रोज कचरा गाड़ी नहीं आएगी, तब तक शुल्क देना अन्याय होगा।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

स्थानीय शासन के जानकार मानते हैं कि ये कदम देर से ही सही, लेकिन जरूरी था। उनका कहना है कि दुनिया भर में स्थानीय निकाय अपनी आय से ही चलते हैं। अगर पंचायतें फंड के लिए सिर्फ ऊपर नहीं देखेंगी, तभी गांव का विकास टिकाऊ होगा।

लेकिन साथ ही वो ये भी कहते हैं कि वसूली से पहले पारदर्शिता जरूरी है। पैसा कहां खर्च हो रहा है, इसका हिसाब हर 3 महीने में गांव की चौपाल में रखा जाए।

आगे क्या?

फिलहाल राज्य सरकारें पंचायतों को टारगेट दे रही हैं। अगले 6 महीने में सभी पंचायतों को प्रस्ताव पास करके दरें तय करनी होंगी। अप्रैल 2027 से वसूली शुरू होने की संभावना है।

सवाल अब ये नहीं है कि कर लगेगा या नहीं। सवाल ये है कि क्या सरकार गांव वालों को बदले में बेहतर पानी, सफाई और रोशनी दे पाएगी?

आपकी राय:

क्या आप इस फैसले को “आत्मनिर्भर गांव” की ओर एक कदम मानते हैं, या इसे ग्रामीणों पर “अतिरिक्त बोझ” समझते हैं?

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button